आज इस शान्तिपूर्ण पदयात्रा में शामिल सभी लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए, मैं देशभक्त वीर लोगा राङच़ेन को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। चीन की सरकार द्वारा तथाकथित ‘जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाले क़ानून’ को 1 जुलाई, 2026से लागू किए जाने के दूसरे दिन, 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के सामने तिब्बत का राष्ट्रीय ध्वज लेकर तिब्बत की स्वतंत्रता के समर्थन और चीनी सरकार के विरोध में उन्होंने आत्मदाह कर अपना जीवन बलिदान किया था। आज उनके बलिदान को सात सप्ताह पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर उन्हें तथा तिब्बत के भीतर और बाहर धर्म, राजनीति और तिब्बती राष्ट्रहित के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले सभी लोगों को श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है। काशाग और निर्वासिततिब्बती संसद के संयुक्त आयोजन में आज सुबह थेगछेन छोएलिङ मन्दिर में विशेष पूजा और प्रार्थना की गई, जिसके बाद यहशान्तिपूर्ण पदयात्रा आयोजित की गई।
चीनी सरकार द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने के बाद से पूरे तिब्बत में खनिजों का दोहन, वनों की कटाई, दक्षिण से उत्तर की ओर जल स्थानान्तरण तथा बाँध और विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों को भारी नुकसान पहुँचाया गया है। साथ ही, तिब्बती लोगों के मूलभूत मानवाधिकारों और धार्मिक आस्था, आवागमन, अभिव्यक्ति तथा अपनी भाषा के संरक्षण और विकास की स्वतंत्रता पर कठोर प्रतिबन्ध लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, लाखों तिब्बती बच्चों को जबरन चीनी आवासीय विद्यालयों में भेजा जा रहा है, जहाँ उन्हें अपनी धर्म, संस्कृति और तिब्बती भाषा सीखने के अवसर से वंचित कर केवल चीनी भाषा में शिक्षा दी जा रही है।
चीनी सरकार ने तथाकथित “दूसरी पीढ़ी की नीति” के तहत तिब्बती लोगों की इच्छा के विरुद्ध तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण और संसाधनों पर कठोर एवं विनाशकारी नीतियाँ लागू कीं। इसके विरोध में तिब्बत के भीतर और बाहर अनेक आन्दोलन किए गए। विशेष रूप से, 2009 से अब तक प्राप्त प्रमाणित रिपोर्ट के अनुसार लगभग 157 तिब्बती देशभक्त वीरों और वीरांगनाओं ने आत्मदाह कर चीनी सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध किया है।
इसी प्रकार, तिब्बत से बाहर रह रहे तिब्बती भी चीनी सरकार की नीतियों के विरोध में लगातार विभिन्न आन्दोलन और गतिविधियाँ करते रहे हैं। हाल ही में लोगा राङच़ेन ने 2 जुलाई को आत्मदाह से पहले अपने अन्तिम वीडियो सन्देश में उन्होंने कहा था –
“चीनी कम्युनिस्ट सरकार की नीतियों ने सभी तिब्बतियों के अस्तित्व, अधिकारों और स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। ……………………………………………… हम सभी तिब्बती हैं और हमें तिब्बत तथा तिब्बती राष्ट्र के हित में मिलकर कार्य करना चाहिए। आज तिब्बतियों के पास मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और परम पावन दलाई लामा जी का चित्र रखने तक की स्वतंत्रता नहीं है, क्योंकि हमने तिब्बत की स्वतंत्रता खो दी है। इसलिए तिब्बती सरकार, संसद और आम जनता को एकजुट होकर तिब्बत और तिब्बती राष्ट्र के लिए कार्य करना तथा पूर्ण एकता बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है।”
उनके अन्तिम सन्देश के अनुसार, यह बलिदान चीनी कम्युनिस्ट सरकार की तिब्बत में जारी कठोर और दमनकारी नीतियों का परिणाम है। तिब्बतियों के ऐसे बलिदानों की सच्चाई अब विश्व के सामने स्पष्ट है। फिर भी, चीनी सरकार इन घटनाओं की अनदेखी कर झूठी और भ्रामक जानकारी का समाचार माध्यमों तथा सोशल मीडिया के जरिए प्रचार कर रही है, ताकि लोगों को गुमराह कर वास्तविक स्थिति के बारे में ग़लत धारणा उत्पन्न की जा सके।
इस गम्भीर और कठिन परिस्थिति में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से नैतिकता एवं न्याय के आधार पर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने का आह्वान करते हैः
- जातीय एकता और प्रगति क़ानून के कार्यान्वयन तथा उसके मानवाधिकारों सम्बन्धी प्रभावों की निकटता से निगरानी की जाए और निरन्तर अन्तर्राष्ट्रीय समीक्षा सुनिश्चित की जाए।
- संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्रों के माध्यम से स्वतंत्र जाँच का समर्थन किया जाए, जिसमें मानवाधिकारों के लिए उच्चायुक्त का कार्यालय, विशेष प्रतिवेक, संधि निकाय तथा सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (Universal Periodic Review) प्रक्रिया शामिल हैं।
- जातीय एकता और प्रगति क़ानून के कार्यान्वयन तथा उसके परिणामों के सम्बन्ध में सार्वजनिक रूप से चिन्ता व्यक्त की जाए।
- द्विपक्षीय वार्ताओं और बहुपक्षीय मंचों, जिनमें संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ शामिल हैं, में इस मुद्दे को उठाया जाए।
- तिब्बतियों तथा अन्य प्रभावित राष्ट्रीयताओं के सांस्कृतिक, भाषाई, धार्मिक और मानवाधिकारों के रक्षा का समर्थन किया जाए।
- अन्तर्राष्ट्रीय सत्र पर सीमापार दमन (Transnational Repression) का मुकाबला करने के उपायों को सुदृढ़ किया जाए तथा अपने देश में रहने वाले तिब्बती समुदायों, मानवाधिकार रक्षकों और समर्थकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। विश्व में लोकतान्त्रिक स्वतंत्रताओं के लिए ख़तरा उत्पन्न करने वाले अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले सभी प्रकार के दमन का विरोध किया जाए।
- यह स्वीकार किया जाए कि तिब्बत पर बलपूर्वक आक्रमण और कब्ज़े से पूर्व तिब्बत ऐतिहासिक रूप से एक स्वतंत्र राष्ट्र था।
- चीनी जनवादी गणराज्य के नेतृत्व पर इस बात के लिए ज़ोर दिया जाए कि वह तिब्बत और चीन के बीच संघर्ष के समाधान के लिए शान्तिपूर्ण संवाद हो तथा परम पावन दलाई लामा की परिकल्पना के अनूरूप तिब्बती लोगों की शान्तिपूर्ण एवं अहिंसक आकांक्षाओं का समर्थन करें।
जातीय एकता और प्रगति क़ानून का कार्यान्वयन केवल तिब्बत ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक एवं भाषाई स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और मानवाधिकार व्यवस्था को अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय कितना महत्व देता है या नहीं। किसी समुदाय की पहचान पर संकट आने से मानवाधिकारों के मूल सिद्धान्त भी प्रभावित होते हैं। तिब्बती लोगों का संघर्ष सत्य, करुणा और अहिंसा पर आधारित रहा है; इसलिए अन्याय के सामने मौन रहना दमन को बढ़ावा देता है। हम अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से तिब्बती लोगों के साथ खड़े होने तथा मानव गरिमा, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और सार्वभौमिक मूल्यों की रक्षा करने का आग्रह करते हैं। स्थायी शान्ति और एकता बलपूर्वक आत्मसातीकरण या पहचान मिटाने से नहीं, बल्कि मानव गरिमा, सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक स्वतंत्रता, न्याय और सार्थक संवाद के सम्मान से ही सम्भव है। तिब्बत का भविष्य आत्मसातीकरण से नहीं, संवाद से; बलपूर्वक नहीं, न्याय से निर्धारित होना चाहिए।
रङच़ेन लोगा के आत्मदाह से किए गए बलिदान ने संयुक्त राष्ट्र, विभिन्न सरकारों और विश्व समुदाय के सामने तिब्बत की पीड़ा और कठिनाइयों को उजागर किया तथा तिब्बती लोगों के सत्य और न्याय के संघर्ष में एक नया अध्याय जोड़ा।इसके बाद 3 जुलाई को निर्वासित तिब्बती संसद ने प्रेस विज्ञप्ति जारी की और दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारों, संसदों,संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ तथा अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों को 837 अपील-पत्र भेजे। अन्तर्राष्ट्रीय समाचार माध्यमों, तिब्बत समर्थक संसदीय समूहों और तिब्बती संगठनों को भी ई-मेल एवं पत्रों के माध्यम से आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया गया। तिब्बती संसद के भारत स्थित तिब्बती बस्तियों के दौरे के दौरान सदस्यों को लोगा राङच़ेन के बलिदान के बारे में जनता को जानकारी देने के निर्देश दिए गए। जुलाई के अन्त में भारत सरकार के मानसून सत्र को ध्यान में रखते हुए, निर्वासित तिब्बती संसद के उपाध्यक्ष के नेतृत्व में दो प्रतिनिधिमण्डल बनाए गए, जिन्होंने केन्द्रीय मन्त्रियों, लोकसभा एवं राज्यसभा के सांसदों तथा अन्य प्रमुख व्यक्तियों से मिलकर तिब्बत के मुद्दे पर समर्थन माँगा और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए। आगामी सितम्बर में संसद सत्र के दौरान सभी तिब्बती सांसदों की बैठक आयोजित कर आगे की गतिविधियों की रणनीति पर विचार-विमर्श करने की योजना है।
दुनिया भर के तिब्बतियों और तिब्बत समर्थकों ने देशभक्त लोगा राङच़ेन के बलिदान के सम्बन्ध में विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित की हैं। विशेष रूप से, न्यूयॉर्क के तिब्बतियों और विभिन्न संगठनों के प्रयास सराहनीय हैं। तिब्बत के मुद्दे का न्यायपूर्ण और अन्तिम समाधान होने तक सभी तिब्बतियों एवं समर्थकों से तिब्बत के समग्र हित और मूलभूत उद्देश्य के लिए पहले से अधिक साहस और दृढ़ संकल्प के साथ निरन्तर प्रयास करते रहने का आह्वान किया गया है।
अन्त में, मैं प्रार्थना करता हूँ कि तीनों लोकों के समस्त प्राणियों तथा विशेषकर तिब्बती लोगों के परम रक्षक परम पावन दलाई लामा जी का पवित्र जीवन और दीर्घायु सैकड़ों कल्पों तक स्थिर रहे तथा उनकी सभी पवित्र इच्छाएँ निर्बाध रूप से पूर्ण हों। साथ ही, तिब्बत की स्वतंत्रता की पुनःस्थापना के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले सभी लोगों की अन्तिम इच्छाएँ भी पूर्ण हों, ऐसी हृदय से प्रबल प्रार्थना करता हूँ। तिब्बती निर्वासित संसद 20 अगस्त, 2026 को।




