आज का दिन अत्यन्त विशेष है, क्योंकि परम पावन दलाई लामा जी के दूरदर्शी विचारों और अपार करुणा के फलस्वरूप तिब्बती जनता को अमूल्य और सच्ची लोकतान्त्रिक व्यवस्था का उपहार प्राप्त हुए पूरे 66 वर्ष हो गए हैं। इस अवसर पर परम पावन दलाई लामा जी के प्रति हम अनगिनत बार श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए, उनके अतुलनीय उपकार के लिए हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। साथ ही, तिब्बत के भीतर और निर्वासन में रह रहे सभी तिब्बती भाइयों और बहनों को निर्वासित तिब्बती संसद की ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित करते हैं।
निर्वासन में आने के कुछ ही समय बाद, 3 फरवरी 1960 को पवित्र बौद्ध तीर्थस्थल बोधगया में परम पावन दलाई लामा जी के समक्ष निर्वासित तिब्बती समुदाय के विभिन्न क्षेत्रों से आए भिक्षु एवं आम जनता द्वारा दीर्घायु प्रार्थना तथा अपनी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण प्रतिज्ञा प्रस्तुत की गई थी। उस अवसर पर परम पावन दलाई लामा जी ने निर्देश देते हुए कहा था कि तिब्बत की व्यवस्था पहले जैसी नहीं रहनी चाहिए, बल्कि तिब्बत को धर्म और राजनीति दोनों पर आधारित एक लोकतान्त्रिक सरकार की आवश्यकता है। इसलिए व्यापक तिब्बती जनता के प्रतिनिधियों द्वारा लोकतान्त्रिक ढंग से निर्वाचित एक प्रतिनिधि सभा होनी चाहिए।
इसी उद्देश्य से उन्होंने निर्देश दिया कि चार प्रमुख धार्मिक परम्पराओं में से प्रत्येक से एक-एक प्रतिनिधि तथा तिब्बत के तीन प्रमुख प्रान्तों में से प्रत्येक से तीन-तीन प्रतिनिधि चुने जाएँ। उन्होंने यह भी कहा कि अपने-अपने क्षेत्रों में लौटने के बाद जनता के बीच से ऐसे लोगों का चुनाव किया जाए जो शिक्षित, योग्य, देशभक्त, समर्पित तथा जनता के विश्वास एवं भरोसे के योग्य हों।
परम पावन के इन निर्देशों के अनुसार, तिब्बती बस्तियों के विभिन्न क्षेत्रों से तीन प्रमुख प्रान्तों के तीन-तीन प्रतिनिधियों और चार प्रमुख धार्मिक परम्पराओं के एक-एक प्रतिनिधि का चयन कर नामों की सूची प्रस्तुत की गई। परम पावन की स्वीकृति के बाद पहली तिब्बती जनप्रतिनिधि सभा का गठन हुआ। इन प्रतिनिधियों ने 2 सितम्बर, 1960 को प्रातः 9 बजे परम पावन दलाई लामा जी के समक्ष उपस्थित होकर शपथ ग्रहण की। इसी के साथ धर्म और राजनीति दोनों पर आधारित तिब्बती लोकतान्त्रिक सरकार की औपचारिक शुरुआत हुई। तिब्बती लोकतन्त्र सत्ता के लिए संघर्ष करके प्राप्त की गई व्यवस्था नहीं है। यह दूरदर्शी नेता परम पावन दलाई लामा द्वारा तिब्बती जनता की क्षमता और सामर्थ्य पर विश्वास करते हुए दिया गया एक महान उपहार है।
इसलिए, आज का दिन हम सभी हिमभूमि तिब्बतवासियों के लिए परम पावन दलाई लामा जी के महान उपकार को स्मरण करने का अवसर है। निर्वासन में हमें लोकतान्त्रिक अधिकारों का उपयोग करने का अवसर मिला है। इसके लिए हम प्रसन्नता और श्रद्धा के साथ उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। हमें लोकतान्त्रिक व्यवस्था को निरन्तर विकसित करते हुए अपने-अपने दायित्वों में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। साथ ही, निर्वासन में हमने लोकतन्त्र और स्वतंत्रता के जिन मूल्यों का अभ्यास किया है, उन्हें भविष्य में उस समय उपयोगी बनाना चाहिए, जब तिब्बत के भीतर और बाहर रहने वाले तिब्बती पुनः एक साथ मिलेंगे, ताकि तिब्बत में लोकतन्त्र,शान्ति और पारस्परिक सम्मान की सुदृढ़ नींव स्थापित की जा सके।
1961 में भविष्य के तिब्बती संविधान के मूल सिद्धान्तों का प्रारूप प्रस्तुत किया गया और 1963 में तिब्बत का संविधान सार्वजनिक रूप से घोषित किया गया। इसके बाद 1991 में परम पावन दलाई लामा जी ने तिब्बती जनप्रतिनिधि सभा को उसके नाम और कार्य के अनुरूप विधायिका के रूप में परिवर्तित किया। ग्यारहवीं निर्वासित तिब्बती संसद द्वारा पारित निर्वासन में तिब्बतियों के संविधान को 28 जून, 1991 को परम पावन दलाई लामा जी की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसके साथ निर्वासित केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन को एक लिखित मूल क़ानून पर आधारित आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में परिवर्तित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया।
2001 में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को पूर्ण करने की दिशा में परम पावन के निर्देशानुसार तिब्बती जनता ने प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से राष्ट्रपति (सिक्योङ) का चुनाव करना शुरू किया। यह तिब्बती लोकतन्त्र के विकास की दिशा में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। तिब्बती संघर्ष को किसी एक व्यक्ति पर निर्भर न रखना और उसे दीर्घकाल तक सुदृढ़ एवं प्रभावी बनाए रखना आवश्यक है–इस दूरदृष्टि को ध्यान में रखते हुए, 2011 में परम पावन दलाई लामा जी ने गंदेन फोड्राङ सरकार द्वारा लगभग चार सौ वर्षों तक निभाई गई तिब्बत की राजनीतिक सत्ता और ज़िम्मेदारियाँ पूरी तरह से जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित नेतृत्व को सौंप दीं।
इस प्रकार, उन्होंने केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन को लोकतन्त्र के सभी प्रमुख अंगों से युक्त एक आधुनिक एवं मानक लोकतान्त्रिक ढाँचे के रूप में विकसित करने में महान योगदान दिया। आज निर्वासित केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन में जाति, वंश, ग़रीबी-अमीरी अथवा प्रभाव और शक्ति के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव किए बिना, लोगों की योग्यता, ज्ञान और अनुभव के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है। सार्वजनिक कार्य किसी व्यक्ति की मनमानी के आधार पर नहीं, बल्कि क़ानून के शासन के आधार पर संचालित होना तिब्बती लोकतन्त्र का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मूल्य और गौरव है।
तिब्बत में रह रहे हमारे तिब्बती भाई-बहनों की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। वे लोकतान्त्रिक व्यवस्था का लाभ उठाना तो दूर, चीनी कम्युनिस्ट सरकार द्वारा उनके मूलभूत मानवाधिकारों का व्यापक रूप से हनन किया जा रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता, आवागमन की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा तिब्बती भाषा के संरक्षण और विकास की स्वतंत्रता जैसी मूलभूत स्वतंत्रताएँ भी वहाँ उपलब्ध नहीं हैं।
1949 में चीनी कम्युनिस्ट सरकार द्वारा तिब्बत में आक्रमण और हस्तक्षेप शुरू किए जाने तथा 1959 में तिब्बत की राजनीतिक सत्ता पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित किए जाने के बाद से तिब्बत के विभिन्न क्षेत्रों में खनिजों का व्यापक उत्खनन, जंगलों की कटाई, नदियों के जल का स्थानान्तरण, बिजली परियोजनाओं का निर्माण तथा नदियों पर बाँध बनाकर उनके प्रवाह को रोकने और बदलने जैसे कार्य किए जा रहे हैं। इन गतिविधियों से तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण को गम्भीर क्षति पहुँची है और यह प्रक्रिया अब भी जारी है।
इसके अतिरिक्त, तिब्बती धर्म और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहे 6,000 से अधिक मठों और धार्मिक संस्थानों को नष्ट कर दिया गया। तिब्बती धर्म, संस्कृति, परम्पराओं और जीवन-मूल्यों को गम्भीर क्षति पहुँचाई गई। विभिन्न प्रकार के अमानवीय अत्याचारों के परिणामस्वरूप 12 लाख से अधिक तिब्बतियों के मारे जाने की बात कही गई है। आज भी तिब्बत में रहने वाले तिब्बतियों को पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है और बड़ी संख्या में लोग हत्या, गिरफ्तारी, कारावास तथा हिरासत जैसी गम्भीर परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। इसी कारण तिब्बत में मानवाधिकारों की बहाली, परम पावन दलाई लामा जी की तिब्बत वापसी तथा तिब्बत की स्वतंत्रता और स्वाधीनता जैसी माँगों को लेकर चीनी सरकार के विरुद्ध समय-समय पर शान्तिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन होते रहे हैं। विशेष रूप से वर्ष 2009 से, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 157 तिब्बती देशभक्त पुरुषों और महिलाओं ने चीनी सरकार की कठोर नीतियों के विरोध में आत्मदाह किया है।
चीनी कम्युनिस्ट सरकार ने एकता और विकास के नाम पर ऐसी नीतियाँ अपनाई हैं, जिन्हें वक्तव्य तिब्बती राष्ट्रीय पहचान को समाप्त करने की रणनीति के रूप में देखता है। इसी सन्दर्भ में तथाकथित “जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला क़ानून”लागू किया गया है। इस क़ानून के लागू होने के दूसरे दिन, अर्थात् 2 जुलाई, 2026 को, तिब्बती देशभक्त लोगा रङच़ेन ने अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने तिब्बत की स्वतंत्रता और स्वाधीनता की पुनर्स्थापना की माँग को लेकर चीनी कम्युनिस्ट सरकार के विरोध में आत्मदाह किया और उनका निधन हो गया। यह अत्यन्त दुखद घटना है।
यह क़ानून केवल तिब्बतियों या चीनी शासन के अधीन रहने वाले कुछ अन्य जातीय समुदायों की समस्या नहीं है। जब किसी जातीय समुदाय की पहचान और अस्तित्व को ख़तरा उत्पन्न होता है, तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि कहीं इससे अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था की बुनियाद भी तो ख़तरे में नहीं पड़ रही है। इस क़ानून के कारण सीमा-पार दमन और दबाव बढ़ने की आशंका भी है। इसलिए, स्वतंत्र देशों में सत्य और अहिंसा के माध्यम से स्वतंत्रता की बहाली के लिए अभियान चलाने वाले तथा उनका समर्थन करने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
स्वतंत्र देशों में रहने वाले तिब्बती समुदाय के प्रतिनिधियों को भी इन देशभक्त पुरुषों और महिलाओं के बलिदान को स्मरण रखते हुए चीनी सरकार की इस नीति के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए, अपने-अपने क्षेत्रों में जागरूकता फैलानी चाहिए और तिब्बत के मुद्दे के लिए अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त
करने के प्रयासों को निरन्तर आगे बढ़ाना चाहिए।
देशभक्त लोगा रङच़ेन जी ने अपने अन्तिम सन्देश में कहा था कि हमें लोकतन्त्र परम पावन दलाई लामा जी से मिला है। उन्होंने हमें वास्तविक और आदर्श लोकतान्त्रिक व्यवस्था प्रदान करके ऐसा महान उपकार किया है, जिसकी तुलना करना कठिन है।
उन्होंने आगे कहा कि परम पावन ने हमें बिना किसी आर्थिक लागत के लोकतंत्र प्रदान किया, फिर भी हम पहले उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। इसके बावजूद, परम पावन दलाई लामा जी ने हमें एक आदर्श लोकतान्त्रिक व्यवस्था प्रदान की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परम पावन द्वारा दिया गया लोकतन्त्र आपस में लड़ने या आन्तरिक संघर्ष के लिए नहीं है, बल्कि तिब्बती लोगों और तिब्बत के हित में प्रगति करने के लिए है।
उनके इन शब्दों को ध्यान में रखते हुए, लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हर पाँच वर्ष के अन्तराल पर तिब्बती राजनीतिक नेतृत्व को बदलने का अवसर मिलता है। इसलिए, निर्वासन में लागू लोकतन्त्र को हमें अपने-आप प्राप्त हुआ कोई साधारण लाभ नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे अपना दायित्व और संरक्षण योग्य मूल्य मानना चाहिए। लोकतन्त्र का प्रयोग करते समय आपसी सम्मान, सहनशीलता, क़ानून के प्रति सम्मान, ज़िम्मेदारी और ईमानदारी को आधार बनाना आवश्यक है। स्वतंत्र देशों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से होती है, लेकिन हम निर्वासन की परिस्थितियों में लोकतन्त्र का अभ्यास कर रहे हैं। इसलिए, तिब्बती जनता की एकता और लोकतन्त्र के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी लम्बे समय तक बनी रहनी चाहिए। यह बात हम सभी को सदैव अपने मन में रखनी होगी।
इस वक्तव्य के समापन से पूर्व, निर्वासित तिब्बती संससद भारत सरकार और भारत की जनता के प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करती है। साथ ही, निर्वासन में हमारे वर्षों की जीवन के दौरान तिब्बत के मुद्दे और तिब्बती लोकतन्त्र के विकास के लिए निरन्तर समर्थन देने वाले सभी लोगों के प्रति भी हार्दिक कृतज्ञता और आभार व्यक्त करती है।
अन्त में, समस्त मानवता के महान मित्र, विश्व शान्ति के अग्रदूत तथा तिब्बत के अन्दर और निर्वासन में रह रहे सभी तिब्बतियों के परम आदरणीय एवं सर्वोच्च नेता, परम पावन दलाई लामा जी की आयु दीर्घ हो तथा उनका जीवन शताब्दियों तक स्वस्थ एवं स्थिर रहे। हम प्रार्थना करते हैं कि उनके महान और दूरदर्शी संकल्प सहज रूप से पूर्ण हों। साथ ही तिब्बत के प्रश्न का न्यायपूर्ण समाधान शीघ्र प्राप्त हो तथा तिब्बत के अन्दर और निर्वासन में रहने वाले तिब्बती शीघ्र ही पुनः एकजुठ हो सकें
निर्वासित तिब्बती संसद
2 सितम्बर, 2026
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इस हिन्दी अनुवाद और इसके तिब्बती मूल पाठ के बीच किसी भी प्रकार की विसंगति होने की स्थिति में, सभी उद्देश्यों के लिए तिब्बती मूल पाठ को ही प्रामाणिक और अन्तिम माना जाएगा।




